मांगलिक दोष एक अपवाद है – आइए जानते हैं सच्चाई और ज्योतिषीय रहस्य।
बहुत से लोग मानते हैं कि जन्म कुंडली में मंगल दोष होने से शादीशुदा जीवन पर नकारात्मक असर पड़ता है। लेकिन यह पूरी तरह सत्य नहीं है । आइए जानते हैं पुरा सच।
👉 मांगलिक दोष होता क्या है?
सबसे पहले बात करते हैं मांगलिक दोष का निर्माण कैसे होता है। जब कुंडली में ग्रह की कोई भी स्थिति बनती है तो वह केवल योग का निर्माण करती है ना किसी दोष का।
ज्योतिष शास्त्र में रुचि रखने वाले व्यक्तियों को यह बात अपने दिमाग में रखनी चाहिए ।
👉कैसे निर्माण होता है मांगलिक दोष का?
एक दिन और एक रात 24 घंटे की होती है और 24 घंटों में बारह लग्न होते हैं । प्रत्येक लग्न कि राशि इन बारह लग्नो में भ्रमण करती है। इसका अर्थ प्रत्येक ग्रह भी सभी भावों में भ्रमण करता है। इसी तरह मंगल ग्रह भी दिन और रात्रि में सभी भावों में भ्रमण करते हैं।
मांगलिक दोष की पहचान जन्मकुंडली में अगर मंगल 1,4,7,8 ,12 भाव में स्थित हो तो मांगलिक योग का निर्माण करता है।
👉मांगलिक दोष का इतना अधिक भय क्यों है ?
आज के समय में जिस घर में बच्चे शादी के लायक हो जाए तो सबसे पहला प्रसन्न मन में आता है कि बेटा या बेटी मांगलिक तो नहीं है। और वो सवाल उनको किसी कुंडली पर विश्लेषण करने वाले के पास लेकर जाता है। और सामने वाला क्या करता है कि एक सिद्धांत के अनुसार कुंडली में मंगल ग्रह कि स्थिति के अनुसार मांगलिक दोष निर्धारित कर देता है। और माता पिता के लिए एक भय का आवरण तैयार कर देता है और उसे अपने आर्थिक फायदे के लिए नग नगीने बता देता है और मंगल दोष निवारण कि पुजा बता देता है । डरा हुआ व्यक्ति इनके बताए हुए सभी उपचार करता है।और डरा हुआ रहता है और जो भय भरी संभावनाएं उसको बताई गई है वह उनके बारे में सोचकर भयभीत रहता है। आपको सच्चाई का पता चल गया है इस लिए भ्रम में ना रहे।
👉मांगलिक दोष कि वास्तविकता क्या है ?
सच्चाई यह है कि मांगलिक दोष का महत्व आज के परिवेश में केवल धन अर्जित करने का कारण मात्र है ।
यह योग दोष रुप में प्राचीन काल में प्रचलन में था जब कन्या कि शादी 12 वर्ष कि आयु में करते थे। उस समय कन्या के विवाह कि आयु कि 12 वर्ष में करने का प्रचलन था।
यह दोष उन कन्याओं को लगता था जिनको मासिक धर्म कि शुरुआत नहीं होती थी।
शास्त्रों के अनुसार कन्या कि संज्ञा उन्हीं कन्याओं को दी जाती है जिनके मासिक धर्म चक्र कि शुरुआत नहीं हुई है। और कुछ अज्ञानी लोग बिना जानकारी के ही भ्रमित ज्ञान का प्रचार कर रहे हैं जाने अंजाने में पाप कर्मों का संग्रह कर रहे हैं।
मांगलिक योग प्रमाणित करने के लिए शास्त्रों में बहु प्रमाण मिलते हैं लेकिन ध्यान ना देने पर ही ज्योतिष के अभ्यास में यह त्रुटियां आती है। और भ्रम कि वृद्धि होती है।
वास्तविक कारण आज के परिवेश में कोई प्रभाव नहीं रखता। क्योंकि आज के समय में कन्या कि शादी 25 वर्ष में करते हैं तो दोष नहीं बनता।यह केवल धन कमाने के लिए गलत प्रचार किया गया है वास्तव में मांगलिक दोष का आज के परिवेश में कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
नारद, कश्यप, श्री पतिनिबन्ध, पराशरादि ज्योतिष के प्रमुख एवं प्रसिद्ध ग्रंथों में जो जानकारी मिलती है उनके आधार पर जो प्राचीन ग्रंथों में जो नीयम वर्णित है।
पीयूषधारा पृ.३१४
सहित – अत एवाह व्यासः – ‘अष्टवर्षा भवेद्गौरी नववर्षा च रोहिणी । दशवर्षा भवेत्कन्या द्वादशे वृषली स्मृता ‘ ।।
अपि च – दशवर्षा भवेत्कन्या अत ऊर्ध्वम् रजस्वला ।।५।।’ इति । – निर्णयसिन्धु पृ. ४५० प्राचीन आचार्यों के मत से १२ वर्ष से ऊपर कन्या संज्ञा नहीं रहती है।
अपि च – दशवर्षा भवेत्कन्या अत ऊर्ध्वम् रजस्वला ।।५।।’ इति । – निर्णयसिन्धु पृ. ४५० प्राचीन आचार्यों के मत से १२ वर्ष से ऊपर कन्या संज्ञा नहीं रहती है।
👉वास्तविक कारण क्या है ?
जन्म कुंडली के बाहर भावों को मनुष्य के शरीर के बारह अंगों को दर्शाता है । जन्म कुंडली में जो ग्रह जिस भाव में स्थित होता है शरीर के उसी हिस्से को अपनी स्थिति के अनुसार प्रभावित करता है।
और मंगल ग्रह व्यक्ति के शरीर में खून और अग्नि का कारक है।
और जिन-जिन भावो में मंगल ग्रह के बैठने से दोष समझा जाता है उन भावों का दोष केवल कन्याओं कि आयु सीमा तक ही सीमित है।
उस समय इस दोष का एक ही उपचार था
वर और कन्या दोनों कि जन्म कुंडली में मंगल कि स्थिति एक जैसी होनी चाहिए।
मांगलिक योग कन्या के लिए मांगलिक दोष का निर्माण करता है और कन्या कि आयु आजके समय में भी 13 से 14 वर्ष तक ही रहती है। मासिक धर्म चक्र कि शुरुआत के बाद कन्या कि संज्ञा से मुक्त हो जाती है। और आज के समय में विवाह कि आयु भी बढ़कर 21 हो चुकी है । तो इस दोष का कोई औचित्य ही नहीं बनता।
ज्योतिष शास्त्र का निर्माण अंधकार को दूर करने के लिए किया गया था लेकिन आज के समय में इसका प्रयोग लोगों को अंधेरे में रखने के लिए किया जाता है।
🌿 इसलिए मांगलिक दोष को भय की दृष्टि से नहीं, बल्कि अपवादों और सही ज्योतिषीय परामर्श के साथ देखना चाहिए।
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👤 Tapeshwar Bhardwaj
