नया अनाज ग्रहण करने का उत्सव।

 

इस मुहूर्त का प्रयोजन है नये अनाज को खाने कि शुरुआत का समय आयुर्वेद के नियमों के अनुसार होना चाहिए। जिससे हमें अनाज का सदुपयोग हो सके। इस दिन पहले अनाज से मिठे व्यंजन बनाए जाते हैं इष्ट देव,ग्राम देव तथा अपने पूर्वजों को भोग लगाया जाता है। अनाज को झूठा ना छोड़ने का संकल्प लिया जाता है।

जब नई फसल घर पर लाई जाती है तो उसे कुछ समय के लिए रख दिया जाता है। क्योंकि नया अनाज खाने के लिए उपयुक्त नहीं होता इसे कुछ समय के लिए रख दिया जाता है।
कुछ समय बाद जब यह खाने के लिए उपयुक्त हो जाता है तो सबसे पहले उसको भगवान का भोग लगाया जाता है और भोग लगाकर खाने कि शुरुआत कि जाती है।

शुभ नक्षत्र:- श्रवण ,घनिष्ठा, शतभिषा, पुनर्वसु, स्वाति ,अश्विनी , पुष्य, हस्त, चित्रा, अनुराधा ,मृगशिरा, रेवती।

शुभ मास :- पौष तथा चैत्र मास को छोड़ कर सभी मास शुभ है।

शुभ लग्न :- सर्वप्रथम अपने इष्ट को भोग लगाते समय लग्न शुद्धि का ध्यान रखे।

लग्नेश बली हो 4,6,8,12स्थान में ना हो तथा पाप ग्रह कि युक्ती ना हो।

शुभ तिथि:- चतुर्थी ,छठी,नवमी,एकादशी,चतुर्दशी तिथि निषेध होती हैं।

शुभ वार:- रविवार ,सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार ,शुक्रवार।
इसमें चंद्रमा विचार नहीं करना चाहिए।

विष घटी पुर्ण निषेध होती है।(विष घटी से अभिप्राय जहर युक्त समय ) विष घटी का समय सर्वदा त्यागना चाहिए। यह नक्षत्र,तिथि, वार मे कुछ घटी बताई गई हैं सो मुहूर्त निकालते समय पुरा ध्यान रखें।

फार्म भरे।
15 दिन के अंतराल में अपनी सुविधानुसार दिनांक का चयन करें।