सीमन्तोन्नयन संस्कार मुहूर्त।

इस संस्कार का प्रयोजन गर्भ धारण करने के बाद स्त्री के मन को खुश तथा शरीर को आरोग्य तथा अदंर जो सन्तान का निर्माण हो रहा है वह भी स्वस्थ रहें। इन सब बातो को ध्यान में रख कर यह संस्कार किया जाता हैं ।
सीमन्तोन्नयन शब्द का अर्थ हैं स्त्रियों के शिर की मांग ।
इस संस्कार में पत्ति अपनी पत्नी के बाल संवारकर उसकी मांग मे सिंदूर भरता हैं । यह उनकी प्रसन्नता तथा संतुष्टि का सूचक हैं । गर्भवती स्त्री कि गर्भ को अनिष्ट करने वाली वस्तुओ को छोङ कर उसकी इच्छा पुरी करनी चाहिए। गर्भवती स्त्री को प्रसन्न रखना चाहिए इससे सन्तान वीर्यवति ओर बलशाली होती हैं तथा इस समय स्त्री को ग्यानवर्धक पुस्तके पढ कर सुनानी चाहिए। भोजन पौष्टिकता से पूर्ण होना चाहिए।

शुभ नक्षत्र:- मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, मूल ,श्रवण ये सभी शुभ नक्षत्र हैं ।
मास विचार सीमंत के लिय आठवां महिना शुभ होता हैं।
शुभ पक्ष:- शुक्लपक्ष शुभ पक्ष होता हैं ।
शुभ तिथी:- सभी शुभ तिथियां।
शुभ वार:- रविवार,बृहस्पतिवार,मंगलवार ।

इस संस्कार में एकागर्ल दोष वर्जित है।


(नारद संहिता :-आठवां महिना हो तथा बलवीर्य को पूरण करनेवाले चार ग्रहों करके सुर्य दृष्ट होवे तब स्त्रियों का प्रथम गर्भविष सीमंतकर्म करना शुभ हैं ।)

गर्भवती स्त्री को चाहिए कि दिन काल में लग्न कुंडली के अनुसार ग्रहों कि स्थिति तथा दिशा को जानकर। कुछ देर के लिए ग्रहों कि तरफ़ गर्भ को रखें।और पति पत्नी दोनों को अपने इष्ट और पूर्वजों का ध्यान करें और पति पत्नी कि मांग भरें। इस समय स्त्री कि मांग भरने से गर्भाशय के विष को समाप्त कर देता है।

इस अवस्था में सूर्य दर्शन रोजाना करने चाहिए।


गर्भ में पल रहे जीव कि चेतना चोथे महीने से स्पष्ट होने लगती है उस समय गर्भ का स्पन्दन आरंभ होने लगता हैं । पाचो इन्द्रियो के विषय में चेतना होने लगती हैं । इच्छा विकसित होने लगती हैं । गर्भ का ह्रदय माता के बीज भाग से उत्पन्न होता हैं । वह रस जिससे गर्भ का विकास होता है वह माता के ह्रदय से जुङा होता हैं । इससे दोनो कि ईच्छाऐं एक सम्मान होती हैं । इस लिय गर्भिणी स्त्री को दो ह्रदय वाली कहा गया हैं ।

आठवें महिने में गर्भ का ओज अस्थिर रहता हैं । ओज का दूसरा नाम वीर्य है ये आठवें महीने अस्थिर रहता है कभी सन्तान में कभी माता में आता जाता रहता हैं । ओर इस समय किसी कारण वश जन्मं हो जाये तो सन्तान में कमजोरी बनीं रहती है । इस समय माता के ओज को बढाने के लिय उसको प्रसन्न रखना आवश्यक होता हैॆ । आठवां महीना निर्माण कि गुणवत्ता को दर्शाता है इस समय गृहिणी को चाहिए कि अपने चित्त को एकाग्र और शांत रखें और अपनी नियमित दिनचर्या का पालन करें,समय पर भोजन करें।आपने जो इस ब्रह्मांड के स्वरूप एक बच्चे के रूप में रचना कि है। यह प्रकृति के सहयोग में जीवन चक्र को लगातार बनाएं रखने में सहायक होता है। अगर आप इस समयावधि में अपनी दिनचर्या में सुधार करके जीवन व्यतीत करते हैं तो सन्तान में भी अनुशासन के गुण विकसित होते हैं।