अंतिम संस्कार।

यह संस्कार जीवन काल का अंतिम संस्कार है। मृत शरीर को अग्नि को समर्पित किया जाता है।
इस संस्कार का कोई भी निश्चित समय नहीं होता ।शास्त्रानुसार रात्रि काल में यह संस्कार वर्जित है।
यदि पंचक नक्षत्रों में यह संस्कार हो तो पंचक शांति अवश्य करवाएं।
इस संस्कार में तिथि वार का कोई दोष नहीं है।
इस संस्कार को लोकाचार के अनुसार ही किया जाता है। समय कि स्थिति के अनुसार विधिवत तरीके से करना चाहिए। इस संस्कार में व्यक्ति कि उपस्थिति को सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।
इस संस्कार का प्रयोजन मृत शरीर को पंचतत्व में विलीन करना है।
इस संस्कार में मृत शरीर के लिए जीव के लिए परमात्मा से आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की जाती है। इसमें कुछ संस्कार दिए जाते हैं जैसे: शव स्नान, पिंड दान, चिता चयन, होम-विधान, अग्नि-दान, मस्तक भेद क्रिया (कपाल क्रिया) और नंदी स्नान, तिलांजलि दान।
इस संस्कार में अलग-अलग क्षेत्र के अनुसार कर्मो में बदलाव किए गए हैं । इसके बाद होने वाली क्रिया शेष अस्थियां गंगा या अन्य पुजनीय नदी में प्रवाहित कि जाती हैं। सनातन परंपरा के अनुसार 12 दिन की शोक सभा के दौरान आयोजित की जाती है। जिसमें गुरुड़ पुराण का पाठ किया जाता है।
शोक सभा के अंतिम दिन मृतक के ज्येष्ठ पुत्र के द्वारा उनके कर्तव्य को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया जाता है।

शोक सभा से पगड़ी पगड़ी रस्म करके देवालयों में जाकर इस संकल्प को किया जाता है और इसके साथ ही शोक सभा समाप्त कर दी जाती है। शोक सभा में ना पहुंचने के कारण जो व्यक्ति रह गये थे उनके लिए समय अवधि का प्रावधान है छमाही कि जाती है शोक सभा कि समाप्ति तथा आशिर्वाद प्राप्ति कि प्रेरणा लेकर समाप्त किया जाता है।। गर्भवती महिलाओं कि जरूरत के लिए तथा प्राचीन काल में यात्रा बहुत लंबे समय कि हुआ करती थी इस कारण जो लोग बाद में आने वाले रिश्तेदारों के लिए शोक सभा हुआ करता थी उनकी जरूरत के अनुसार नियम बनाए गए। इस समयावधि को छमाही कहा गया है। प्राचीन काल में इसकी समयावधि छः महीने कि होती थी लेकिन यह क्षेत्र और आज के परिवेश में यह पंद्रह दिन में संपन्न कर दी जाती है।
परिवार के सभी सदस्यों को एकत्रित करके अंतिम विदाई दी जाती है। और श्राद्ध कर्म का संकल्प लिया जाता है। समय अनुसार परिवार के सभी सदस्यों को एकत्रित करके श्राद्ध पक्ष में श्राद्ध तिथि में पित्तर श्रेणी में स्थापित किया जाता है। और इस दिन अपने पूर्वजों के नाम से दान किया जाता है।