अन्नप्राशन संस्कार मुहूर्त।

अन्न प्राशन संस्कार को क्षेत्रीय परिवेश में जन्मोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है।
अन्नप्राशन शब्द का शाब्दिक अर्थ अन्न कि शुरुआत को दर्शाता है यह संस्कार अन्न ग्रहण कि शुरूवात से जुङा है तथा दुसरा जन्मोत्सव कि शुरूवात से कुछ जगहों पर शिशु को माता के दुग्ध कि प्राप्ति एक वर्ष तक सुनिश्चित है इस लिए जन्मोत्सव पर मां के दुग्ध को छोड़कर अन्ना खाने कि शुरुआत कि जाती है।यहां तक नवजात के सभी संस्कारो कि पुर्ति हो जाती हैं ।

अन्नप्राशन संस्कार का प्रयोजन :-
यह संस्कार बच्चे को मां के दुध के साथ साथ अन्न खिलाने कि शुरूवात करना होता हैं यह संस्कार बच्चे के दांत निकलते है उस समय किया जाता हैं ।बच्चे को मां के दुध के साथ अन्य पोष्टिक तत्वो कि जरूरत पुरी करने कि शुरूवात हैं ।सबसे पहले ये नर्म तथा जल्दी पचने वाले भोजन के साथ इसकी शुरूवात करनी चाहिय। ओर धीरे धीरे इसकी मात्रा बढ़ानी चाहिय। इसके बारे में जानकार से शिशु आहार श्रृखंला कि जानकारी जरूर लें ।(आगनवाङी)

जन्मोत्सव संस्कार भी अन्नप्राशन का हि हिस्सा हैं । यहां बालक को मिष्ठान कि तथा ग्रीष्ट व अन्न कि शुरूवात कि जाती हैं परामर्श अनुसार । इस में संस्कार समय कि गणना दो पद्धतियों से कि जाती है पहले चंद्र वर्ष पद्धति से मनाने का प्रचलन था लेकिन अब ये जानकारी के अभाव में कम हो रहा हैं । कई क्षेत्रो में इसका प्रचलन आज भी है लेकिन कम हैं । आज के समय में सुर्य सिद्धांत के अनुसार मनाया जाता हैं । तथा यह प्रचलन विश्व व्यापी हैं अन्य सभ्यताओं में भी इस पद्धति का प्रचलन ज्यादा हैं । इस संस्कार को एक वर्ष पुरा होने पर स्वास्थय तथा आयु वृद्धि कि कामना करते हुऐ मनाया जाता है। इस संस्कार में अपने पूर्वजों तथा ईष्ट देव का आशिर्वाद प्राप्ति हेतु देव वाणी में आह्वान तथा माता से संकल्प लिया जाता है। देवताओं का आहवान देव वाणी में विधी वत करने का विधान हैं ।

शुभ मास:-
लड़का सम मास शुभ रहता हैं छठा,आठवां, दसवां।
लड़की विषम मास शुभ रहता हैं पाचवां,सातवां,नौवा, ग्यारहवां।
चंद्रमा विचार:-
जातक कि कुडली से गोचर का विचार करे चंद्रमा ६,८,१२ क्षीण तथा अस्त ना हो।
शुभ नक्षत्र:-
अश्विनि ,रोहिणी,मृगशिरा,पुष्य,उत्तराफाल्गुनी,उत्तराषाढा, उत्तराभाद्रपदा,हस्त,चित्रा,स्वाती,अनुराधा,
श्रवण, घनिष्ठा,शतभिषा,रेवती यह सभी नक्षत्र इस कार्य के लिए उत्तम नक्षत्र है।

तिथि विचार:- रिक्ता ,(चतुर्थी तिथि, नवमी तिथि, चतुर्दशी तिथि) क्षय तिथि, नंदा तिथि, द्वादशी, अष्टमी, अमावस्या को त्यागना हैं ।

शुभ वार :-
रविवार , सोमवार , गुरूवार , शुक्रवार , बुधवार आदि शुभ वार होते हैं ।

अन्य ध्यान रखने योग्य बातें।

इस संस्कार में एका गर्ल कि स्थिति दोष वर्जित माना गया है।
नवजात शिशु को अन्न खिलाने कि सुरूआत का शुभ समय दोपहर से पहले।

इस अवसर पर सावड़- सूतक हो तो यह संस्कार मुहूर्त निषेध माना गया हैं ।
माता कि स्थिति मासिक धर्म से सात दिन बाहर हो।